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ध्वनि एक, अर्थ अनेक – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

ध्वनि एक, अर्थ अनेक – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

सुनने और पढ़ने में जो,
लगते एक समान।
पर अर्थों की दृष्टि से,
होती भिन्न पहचान।।
ध्वनि की सूक्ष्म तरंग में,
झलके रूप अनूप।
काव्य सरल कर देता है,
इनका सुंदर रूप।।
1. अनल और अनिल
अनल भड़कती वन में देखो, राख करे पल माहीं,
धीमे-धीमे बहे अनिल जो, सुख देती मन माहीं।
(अनल = आग, अनिल = हवा)
2. गृह और ग्रह
सुंदर प्यारा गृह है अपना, जहाँ बसे परिवार,
नभ मंडल में घूमें ग्रह सब, चंदा और सितार।
(गृह = घर, ग्रह = नक्षत्र/पिंड)
3. कुल और कूल
ऊँचे कुल में जन्म लिया तो, ऊँचे कर्म कमाओ,
नदिया के इस कूल बैठ तुम, अपनी प्यास बुझाओ।
(कुल = वंश/सब, कूल = किनारा)
4. नीर और नीड़
बहता जाए स्वच्छ नीर यह, जीवन का आधार,
चिड़िया तिनका-तिनका चुनती, सजता उसका नीड़ प्यारा।
(नीर = जल, नीड़ = घोंसला)
5. तरणि और तरणी
गगन बीच चमके जो तरणि, फैलाता उजियारा,
पार लगाए नदिया सबको, तरणी का पतवार प्यारा।
(तरणि = सूर्य, तरणी = नाव)
6. अवधि और अवधी
परीक्षा की अवधि है निश्चित, मत करना तुम देरी,
मीठी वाणी बोल रही जो, भाषा है वो अवधी मेरी।
(अवधि = समयकाल, अवधी = एक भाषा)
क्या आप इनमें से किसी विशेष शब्द युग्म पर और कविताएँ चाहते हैं, या हिंदी व्याकरण के किसी अन्य विषय (जैसे पर्यायवाची या विलोम शब्द) को काव्यात्मक रूप में समझना चाहेंगे?
कम से कम चार उदाहरण और भी दें।
यहाँ श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्दों के चार और रोचक उदाहरण काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत हैं:
7. अंश और अंश (अंस)
वीर पुरुष के अंस (कंधे) पर ही, टिका देश का भार,
मेहनत का तुम अंश (भाग) न छोड़ो, यही सफलता का सार।
(अंस = कंधा, अंश = भाग/हिस्सा)
8. दिन और दीन
उगता सूरज दिन लाता है, मिट जाता अंधियारा,
कभी न समझो खुद को दीन, तुम हो प्रभु का प्यारा।
(दिन = दिवस, दीन = गरीब/असहाय)
9. चिर और चीर
चिर काल से चली आ रही, संतों की यह वाणी,
द्रौपदी की लाज बचाई, प्रभु ने बढ़ाया चीर धानी।
(चिर = पुराना/दीर्घकाल, चीर = वस्त्र)
10. आदि और आधी
अंत भला तो सब भला, आदि से सुंदर रीती,
लालच में जो भागे पीछे, हाथ लगे न आधी रोटी।
(आदि = शुरुआत/इत्यादि, आधी = आधा हिस्सा)

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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