एक अभिशाप – विवेक कुमार
बेटी ने पूछा बापू से —
“इतनी ब्याह की क्या जल्दी?”
थोड़ी तो बढ़ जाने दो,
अभी तो मैं नादान हूँ,
थोड़ी तो ढल जाने दो।
अनजान डगर पर चलने से पहले,
जीवन को तो समझ लेने दो।
अभी तो बचपन भी न जिया,
थोड़ा तो जी जाने दो।
खेलों की किलकारी बाकी है,
किताबों से दोस्ती बाकी है,
सपनों की उड़ान अधूरी है,
आँखों में आस अभी बाकी है।
माँग में सिंदूर भरने से पहले,
हाथों में कलम थमा लेने दो,
घर की ज़िम्मेदारी से पहले,
मुझे खुद को पहचान लेने दो।
मैं बोझ नहीं, उम्मीद हूँ पापा,
कल का उजाला हूँ पापा,
आज अगर मुरझा दी गई,
तो कैसे खिल पाऊँ पापा?
कुड़वी रस्मों की बेड़ियाँ,
मेरे पाँव से हटा लेने दो,
बेटी हूँ, इंसान हूँ मैं,
मुझे भी जीने का हक़ दो पापा।
जो आज पढ़ेगी, वही कल
घर को रोशन करेगी,
अधपकी उम्र में ब्याही गई
किस्मत से ही हारेगी।
इस अभिशाप से समाज को
आज ही बचा लेने दो,
बेटी को बेटी रहने दो,
उसे जबरन बहू मत बन जाने दो।
बापू, मेरी एक बात सुन लो —
ये परंपरा नहीं, अपराध है,
जो कलियों को रौंद दे,
वो संस्कृति नहीं, अभिशाप है।
विवेक कुमार
भोला सिंह उच्च माध्यमिक विद्यालय, पुरुषोत्तमपुर
कुढ़नी, मुजफ्फरपुर
