कब सवेरा होगा इन मन के अंधेरों से – कार्तिक कुमार
कब सवेरा होगा इन मन के अंधेरों से,
कब मुक्ति मिलेगी जीवन के विकारों से?
मानव कब मानव बनेगा, प्रेम का दीप जलाएगा,
स्वर्वेद के दिव्य ज्ञान से अंतर्मन को सजाएगा।
स्वर्वेद कहता है, आत्मज्ञान की राह अपनाओ,
मन के मोह-माया को त्याग सत्य का दीप जलाओ।
क्या ज्ञान बढ़ जाता है उच्च जाति पर जाने से,
क्या आत्मा पवित्र होती है ऊँचा पद पाने से?
पद और प्रतिष्ठा से अहंकार बढ़ सकता है,
स्वर्वेद के ज्ञान से अंतर्मन बदल सकता है।
विहंगम योग की साधना जीवन को राह दिखाए,
अंतर की दिव्य चेतना सुप्त आत्मा को जगाए।
स्वर्वेद के अमृत वचन हृदय में उतर जाएँ,
सत्य, प्रेम और करुणा के सुंदर पुष्प खिल जाएँ।
आरती-वंदना से मन में श्रद्धा का दीप जले,
गुरुचरणों की साधना से जीवन निर्मल बने।
स्वर्वेद पढ़कर मानव अपने भीतर झाँके,
झूठ, कपट, अहंकार त्याग सत्य के पथ पर चले।
साधना से मन निर्मल हो, ज्ञान का प्रकाश फैले,
विहंगम योग के पथ पर मानवता का सूरज चमके।
रचनाकार एवं प्रस्तुति: कार्तिक कुमार
मध्य विद्यालय कटरमाला गोरौल वैशाली
सचिव जिला योग संघ वैशाली
7004318121

