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जिज्ञासु के चार प्रकार – कार्तिक कुमार


Kartik Kumar

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जिज्ञासु के चार प्रकार – कार्तिक कुमार

जिज्ञासु चार प्रकार के, गुरु शरणागत जान।
उत्तम, मध्यम, नीच हैं, अधम कोटि के मान।।
योग संविधान स्वर्वेद

गुरु की महिमा अपरंपार, गुरु ज्ञान का सागर है,
गुरु चरणों में जो झुक जाए, उसका जीवन उजागर है।
जिज्ञासु की भिन्न प्रकृति, भिन्न हृदय के भाव,
गुरु की कृपा से मिट जाते, मन के सारे घाव।

प्रथम उत्तम जिज्ञासु की, सुनिए पावन बात,
गुरु-वचन को सत्य मानकर, चलता दिन और रात।
अहंकार को त्यागकर, श्रद्धा का दीप जलाता,
गुरु की आज्ञा पाकर, जीवन सफल बनाता।
नहीं प्रश्नों में उलझता, नहीं संशय का जाल,
गुरु के चरणों में पाता, परम शांति का भाल।

द्वितीय मध्यम जिज्ञासु, करता चिंतन-मनन,
गुरु के वचनों को सुनकर, करता सत्य ग्रहण।
कभी श्रद्धा, कभी संशय, मन में आते विचार,
साधना और सत्संग से, पाता ज्ञान अपार।
धीरे-धीरे मिटते हैं, अज्ञान के अंधकार,
गुरु की कृपा से खुलते हैं, मुक्ति के द्वार।

तृतीय नीच जिज्ञासु की, विचित्र होती चाल,
गुरु के ज्ञान को परखता, करता तर्क-जंजाल।
स्वार्थ सिद्धि की कामना, मन में रखता साथ,
सुविधा मिलने तक ही, चलता गुरु के साथ।
जब मन की इच्छा टूटे, बदल जाए व्यवहार,
श्रद्धा का दीप बुझाकर, करता गुरु से तकरार।

चतुर्थ अधम जिज्ञासु, अहंकार में चूर,
गुरु के दिव्य उपदेशों से, रहता सदा दूर।
ज्ञान की बातें सुनकर भी, नहीं बदलता चाल,
मन में द्वेष और कपट, वाणी में विष की धार।
गुरु की महिमा न समझे, न जाने सत्संग सार,
अपने ही अहंकार में, खोता जीवन आधार।

हे साधक! स्वयं को देखो, किस श्रेणी में स्थान,
गुरु चरणों में समर्पित कर, पाओ दिव्य ज्ञान।
उत्तम बनने का संकल्प, हृदय में आज जगाओ,
श्रद्धा, सेवा, प्रेम से, गुरु कृपा को पाओ।

गुरु ही ज्ञान की ज्योति हैं, गुरु ही मुक्ति द्वार,
गुरु की शरण में मिट जाता, भवसागर का भार।
सच्ची जिज्ञासा हृदय में, सच्चा हो विश्वास,
गुरु कृपा से पूर्ण हो, जीवन की हर आस।

गुरु चरणों में शीश झुकाकर, यही करें अरदास,
ज्ञान, भक्ति और प्रेम से, हो जीवन का विकास।

गुरु कृपा ही साधक का परम सौभाग्य है।

प्रस्तुति: कार्तिक कुमार
राष्ट्रीय योग प्रशिक्षक
मध्य विद्यालय कटरमाला, गोरौल, वैशाली
7004318121
सचिव कार्तिक कुमार जिला योग संघ वैशाली

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