“कुष्माण्डेति चतुर्थकम् ”
रविसम दीप्त देह केर आभा, दुर्गा अष्ट भुजा बाली।
इषित हाससँ सृजित केलहुँ ब्रह्मांड सकल पुनि प्रतिपाली।
सिर पर स्वर्ण मुकुट अति सुन्दर,
युगल कर्ण शोभित कुण्डल।
जयति जय कूष्माण्डा माता,
आदि शक्ति शेरा बाली।
रविसम दीप्त देह केर आभा, दुर्गा अष्ट भुजा बाली। ।
दहिना कर चारहुमे शोभित,
धनुष कमण्डल बाण कमल।
बामा करमे क्रमसः माला,
गदा चक्र आ सुधा कलश।
भक्ति भवनमे राजित माता, दुष्ट संधारन बाली।
रविसम दीप्त देह केर आभा, दुर्गा अष्ट भुजा बाली। ।
रोग शोककेँ हरण करै छी,
चरण शरणमे जे आबय।
साधककेँ दी शिद्धि माता,
सकल लोक शुभ सुख पावय।
भक्ति भावसँ पूजित कय जे गावय दै दै करताली।
रविसम दीप्त देह केर आभा, दुर्गा अष्ट भुजा बाली। ।
आयु यश बल बुद्धि विवेकक,
नित भण्डार भरै छी।
बृद्धि करी आरोग्य भक्त केर,
सुख अम्बार करै छी।
नमन करी हे माँ कुष्मांडा, सृष्टि सकल केर संचाली।
रविसम दीप्त देह केर आभा, दुर्गा अष्ट भुजा बाली। ।
अरविंद मिश्र "नीरज " (कवि जी), सहरसा

