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मर्यादा का मोती_धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

मर्यादा का मोती
सहज प्रकृति का अनुपम गहना, जीवन का यह शाश्वत सार,
मन, मोती और दूध-रस का, सुंदर पावन है व्यवहार।
जब तक इनमें सहज भाव है, तब तक जग में गरिमा गाती,
एक बार जो मर्यादा टूटे, फिर वो गरिमा लौट न आती।
मन का दर्पण बड़ा अनूठा, पल में खुशियाँ, पल में रोना,
नेह-डोर से बंधा हुआ है, इसका हर एक कोना-कोना।
पर दुर्भावना की ठेस लगे तो, दरक जाय यह कोमल मन,
कोटि यतन कर थका ज़माना, जुड़ता नहीं कभी यह दर्पन।
सीप के भीतर छिपा हुआ जो, मोती अपनी आभा लाता,
श्वेत कांति की धवल छटा से, सबका मन है वो हरषाता।
अगर तनिक भी दरार आ जाए, खंडित उसकी काया होती,
फिर चाहे जितने यत्न करो तुम, जुड़ता नहीं दुबारा मोती।
दूध और रस की निर्मल धारा, जीवन को जो पोषण देती,
मधुर मिठास और तृप्ति अनूठी, सबके भीतर जो भर देती।
समय की मार या भूल से अपनी, एक बार जो यह फट जाए,
लाख उपाय करो तुम फिर भी, अपनी मूल दशा नहिं पाए।
इसीलिए संभल कर चलना, इस जीवन की राहों में,
सहज भाव की रक्षा करना, अपने मन की बाहों में।
जो अनमोल मिला है तुमको, उसे सहेज कर सदा रखना,
टूट न जाए नेह का धागा, इस सच को तुम याद रखना।

                                        धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।                                           प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 
                                        रानीगंज अररिया
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