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मौन और अनुभव :- धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

मौन और अनुभव :- धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर

चलो अब जाने भी दो क्या करोगे कथा सुनकर,

ये चोट जो गहरी हैं, उन्हें क्या पाओगे छूकर।

मौन तुम समझोगे नहीं जज्बातों की हमारी,

और वर्णन हमसे अब दुख अपना होगा नहीं खुलकर।

कभी वो दौर था जब मासूमियत ही अपनी पहचान थी,

हर एक व्यक्ति की बातों में बसती हमारी जान थी।

हर वस्तु पर भरोसा था, हर चेहरा देवदूत लगता था,

संसार की हर एक रीत हमारे लिए अनजान थी।

मगर समय के थपेड़ों ने कुछ ऐसा पाठ सिखाया है,

मासूमियत को छीनकर, समझदार हमें बनाया है।

अब अनुभव जीवन का इस कदर हावी है हृदय पर,

कि कोई सत्य भी कहे, तो उस पर भी विश्वास न आया है।

अब न शिकायतें हैं किसी से, न कोई नई आस है,

बस अपने ही मौन में छुपा एक गहरा अहसास है।

कथा अधूरी ही भली, अब इसे यहीं रहने दो,

अनुभव के इस साए में, अब मन बेहद उदास है।

न जाने कहाँ खो गई वो बचपन की सादगी,

जहाँ हर एक मोड़ पर मुस्कुराती थी जिंदगी।

अब तो चेहरों के पीछे छिपे चेहरे खोजते हैं,

विश्वास की जगह अब तो बस छल करती है जिंदगी।

एकांत से अब हमारी कुछ ऐसी मित्रता हो गई,

खुद से ही बातें करना जैसे विवशता हो गई।

अब कोई पूछे स्थिति तो मुस्कुराकर कह देते हैं ‘ठीक’,

कथा छुपाने की कला अब हमारी सबसे प्रिय हो गई।

चलो अब छोड़ो भी, ये बातें यहीं समाप्त करो,

जो बीत गया उसे समय के नाम करो।

मौन रहकर ही अब मन को शांति मिलती है,

इस बिखरे हुए जीवन को अब न तुम बदनाम करो।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर  

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

रानीगंज अररिया

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