शायद अब माँ बूढ़ी हो रही है,
पर मन इस बात को मानने से इन्कार कर रहा है।
कभी- कभी बैठे बैठे कहीं खो जाती है,
शायद हमारा बचपन याद करती होगी??
रोटियां खिलाकर गिनती भूल जाती है,
डांट कर 2 और प्लेट में डाल जाती है।
उसके चेहरे और हाथों की झुर्रियां,
हमारी सफलता के पीछे का राज बताती है।।
मन करता है वक्त को यहीं रोक दूं ,
उसकी ममता की छांव में आराम ढूंढ लूं।
हमें संवारने में जिसने अपना पूरा जीवन लगा दिया,
आज उसके लिए कुछ खुशियां बटोर लूं।।
खुशबू कुमारी
मध्य विद्यालय गोला पंचायत जे पी कॉलोनी चंदवारा मुजफ्फरपुर
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