सहेली जंग – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
हम कहाँ हैं, किस दोराहे पर खड़ा संसार है?
बैर भी छलावा यहाँ, बस दिखावा ही प्यार है।
राजविद्या के खिलाड़ी, मंच पर टकरा रहे,
अदृश्य धागों से बंधे, पीछे मगर मुस्का रहे।
दुश्मनी जो दिख रही, वह अभिनय का एक रूप है,
स्वांग रचती छांव है, यह बनावटी ही धूप है।
खींचते तलवार बाहर, एक-दूजे पर मगर,
भीतर ही भीतर मिला है, स्वार्थ का गहरा डगर।
खेल क्या परदे के पीछे, आम जन जाने नहीं,
एक कोख से जन्मे स्वार्थों को पहचानें नहीं।
मंच के इस पार हम, आपस में लड़ते रह गए,
जीत का जश्न उस पार वो, मिलकर के मनाते रह गए।
जानती भोली न जनता, इस बिसात की चाल को,
उलझा देते हैं चतुर, हर सीधे-साधे सवाल को।
रंगमंच इस नीति का, हर चेहरा एक पहेली है,
जंग जिसको हम समझ रहे, वो अंदर से सहेली है।
इस सियासत के पटल पर, चाल पहले से तय यहाँ,
चीख जनता की महज़, इक गूंज बन खोती यहाँ।
वोट की खातिर बने जो, कल तलक जानी-ज़िगर,
बैठ कमरों में रच रहे, नई कहानी आज मगर।
बनके कठपुतली हम सभी, उनके इशारों पर ढल रहे,
वह हमारे जज़्बातों को, तराज़ू में तोल रहे।
मिट रहा है आम इंसां, झूठी वेदी की जंग में,
सत्ता का यह खेल शाश्वत, चलता अपने रंग में।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

