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हम है कर्जदार – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
हम है कर्जदार
हाँ, हम कर्जदार हैं…
गुनाहगार नहीं, बस जिम्मेदारियों के बीमार हैं।
सिर्फ इसलिए कि हमें स्वाभिमान से जीना है,
ईमानदारी की चौखट पर, आंसुओं का घूंट पीना है।
दो वक्त की सूखी दाल-रोटी तो यूँ भी कट जाती,
मगर बच्चों के सपनों को हमें पंख जो देना है।
एक अदद छत की खातिर, ईंट-ईंट को जोड़ना है,
लाड़ली बेटियों के ब्याह का, वो कठिन रुख मोड़ना है।
इस समाज की रीत निभाने, अपनों के भविष्य के लिए,
हंसते-हंसते हमें अपनी हड्डियों को तोड़ना है।
हाँ, कर्ज लिया है तो दुनिया के ताने भी सहेंगे,
जहरीले तीखे बोल और बेरुखी के दरिया में बहेंगे।
झिड़कियाँ, गालियाँ और वो झुकी हुई नजरें…
जब दिन ही अपना तंग है, तो हम चुप ही रहेंगे।
बड़ी कठिन है डगर, हर सुबह एक नया इम्तिहान लाती है,
सूरज की पहली किरण के साथ, बस एक ही चिंता सताती है।
बिना रुपयों के कैसे गुजारें ये जिंदगी, कैसे थामें ये सांसें,
शाम ढलते ही यह मायूसी, रूह को झकझोर जाती है।
मगर सुनो ऐ वक्त के थपेड़ों! हम कमजोर जरूर हैं, टूटे नहीं,
फर्ज की इस जंग में, हमारे कदम अभी पीछे छूटे नहीं।
यह कर्ज हमारी लाचारी है, पर हमारा जमीर अभी जिंदा है,
जो अपनों के लिए सब सह जाए, वो इंसान कहाँ शर्मिंदा है?
आज माथे पर चिंता की लकीरें हैं, तो क्या हुआ,
हाथों में छालों की तकदीरें हैं, तो क्या हुआ।
इस तपती हुई धूप के बाद, एक शीतल छांव भी आएगी,
हमारी ईमानदारी की यह गवाही, एक दिन इतिहास बनाएगी।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंजअररिया

