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शाश्वत नियम – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
शिखर पर बैठ ओ पथिक! तनिक तू किसपे इतराता?
बनाकर काँच के भवनों को, क्यों अपनी शौर्य दिखलाता?
अहंकार मत कर मानव, यह जीवन एक छाया है,
जिन्होंने ख़ुद को प्रभु माना, उन्होंने मुँह की खाया है।
निकल जाता है सब ऐश्वर्य, धरी रह जाती है शक्ति,
अगर इक कंकड़ी छोटी, भोजन में आ जाए दुर्भाग्य से।
हँसता-खेलता मानव भी, ग्रास उगल देता है,
समय की चोट लगते ही, भ्रांति का भवन ढह जाता है।
न कोई लेखा-जोखा है, न कोई पुस्तिका-जेब है,
मगर उस न्यायकर्ता के घर, हर एक साँस का लेखा है।
तू जग की आँख से अपने, भले ही लाख पाप छुपा ले,
लिखे बिन लिखता है वो, तू चाहे जितने जाल बिछा ले।
न्यायालय इस संसार का, बिके पर न्याय उसका अटल रहता,
“जो जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे”—सनातन नियम यही कहता।
उसे कागज़ की परवाह नहीं, वो अंतःकरण को पढ़ता है,
तेरा हर कर्म ही, तेरी अनूठी नियति गढ़ता है।
समेटे नदियाँ सारी, जो लाखों अंधड़ पीता है,
मगर फिर भी लहर लेकर, वो शांत मौन जीता है।
समाए संसार का जल पर, कभी घट भर नहीं पाता,
असीम सागर का वो गर्त, हमेशा प्यासा रह जाता।
जहाँ हर रोज़ यात्री, माटी में मिलने को आते हैं,
मिट्टी की इस देह को, वहीं पर छोड़ जाते हैं।
करोड़ों मृतदेह समेटे जो, मगर फिर भी वो ख़ाली है,
महाश्मशान का गर्त देखो, कैसा मौन सवाली है।
जो जलता लोभ की अग्नि में, वो जितना पाता बढ़ता है,
इक गहरे दलदल की भांति, वो हर सुख को निगलता है।
यह ऐसी आग है मानव, जो भीतर-भीतर खाती है,
कितना भी डालो इस गर्त में, संतोष कभी न आती है।
जिसकी चाहतें कभी न थमतीं, वो इच्छाओं का समंदर है,
पूरी सृष्टि मिल जाए, मगर फिर भी भूख अंदर है।
यह प्यास कभी न बुझती है, यह ऐसा अनूठा गर्त बनाया,
इंसान इसी के चक्कर में, अपनी पूरी आयु गँवाया।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

