संघर्ष में ही आनंद – उमेश कुमार सिन्हा
हाथ में लेखनी, दिल में संस्कारों के अरमा,
यही है हमारे जीवन की सच्ची पहचान।
लेखनी से सुख-दुःख की अनुभूति गढ़ता हूँ,
संस्कारों के सहारे काँटों में भी बढ़ता हूँ।
संघर्ष कठिन है, जो नींद उड़ा ले जाता है,
कामयाबी पाने को जी-जान लगवाता है।
वह आनंद ही क्या, जिसमें संघर्ष न हो,
वह प्यास ही कैसी, जिसमें तड़प का अंश न हो!
थककर प्यासे को जब पानी अमृत-सा लगता है,
तृप्ति का सुख उसके मन में आनंद जगाता है।
भूख की कड़वाहट में गर्म रोटी मनभाती है,
श्रम की कमाई हर निवाले में स्वाद भर जाती है।
वह आनंद ही क्या, जो श्रम के बिना मिल जाता है,
पसीने से सींचा फल ही सच्चा सुख दे जाता है।
आलस की आदत जीवन का उत्साह मिटाती है,
मेहनत से बनी रोटी मन को तृप्त कर जाती है।
सपने देखो तो मन में हलचल मच जाती है,
उन्हें पाने की चाह रातों की नींद उड़ाती है।
मखमली चादर भी काँटों-सी लगने लगती है,
जब लक्ष्य की धुन मन में दीप जलाने लगती है।
सपने केवल देखने से साकार नहीं होते,
बिना परिश्रम के जीवन के अरमान पूरे नहीं होते।
कठिनाइयों की लहरों से साहसपूर्वक लड़ना होगा,
समय की हर चुनौती में आगे बढ़ना होगा।
अहंकार का विष पीकर कोई ऊँचा नहीं उठता,
समय गँवाने वाला फिर पछतावे में है डूबता।
समय का मोल समझो, कर्मपथ पर बढ़ते जाओ,
संस्कारों की ज्योति से जीवन सफल बनाओ।
हाथ में लेखनी हो, हृदय में ऊँचे अरमान,
श्रम, संस्कार और संघर्ष—यही जीवन की पहचान!
करे हम ! अग्रज का सम्मान
बड़े-बुजुर्गों का आशीष, जीवन का वरदान,
उनके चरणों में बसता, खुशियों का संसार
स्वरचित रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
बिहार सरकार द्वारा पूर्णतः स्वीकृत विद्यालय
गोस्वामी तुलसीदास पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर, जिला – बक्सर

