स्वावलंबी :- धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
जब भी था कठिनता का घेरा,
मैंने हर गिरते को उठाया।
उनके दर्दों को अपना माना,
विपदा में बस हाथ थामना जाना।
पर समय बदला और दृश्य बदला,
अपनों का वो रूप भी बदला।
आज आवश्यकता जब आन पड़ी है,
मौन हर ओर खड़ी है।
संसार को बस भूलें याद रहीं,
जो साथ दिया, वो बात गई।
शिकायत नहीं अब इस जगत से,
सीख लिया है इस एकांत से।
संभवतः जीवन की रीत यही है,
सच्ची सबसे सीख यही है।
जब भी कठिन काल घेरेगा,
मनुष्य खुद ही अपना हाथ थामेगा।
कोई और नहीं इस जीवन में,
मानव खुद ही अपना संबल बनेगा।
भीड़ में भी जो अकेले चलना सीख जाते हैं,
वही इतिहास के पन्नों पर नाम लिख जाते हैं।
आशा की लौ अब परायों से नहीं, खुद से जलाएंगे,
टूटेंगे नहीं कभी, हर ठोकर से और मजबूत हो जाएंगे।
माना कि ये शांतियाँ दिल को थोड़ा दुखाती हैं,
पर यही तो हैं जो हमें खुद से मिलाती हैं।
अब किसी के आश्रय की हमें कोई प्रतीक्षा नहीं,
अपनी नौका के हम खुद नाविक हैं, कोई विवश नहीं।
समय का ये चक्र भी एक दिन बीत जाएगा,
राख से उठकर यह मानव फिर निखर जाएगा।
अब जग के तानों को हम अपनी ढाल बनाएंगे,
खुद ही अपने अंधेरों में उजाला बनकर दिखाएंगे।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोल
रानीगंज अररिया
16-10-2026

