कागज के फूल
कागज़ के जो फूल हैं, सुंदर दिखते आज।
खुशबू इनमें है नहीं, फीका सारा काज।।
चेहरे पर मुस्कान है, भीतर भरी कराह।
नकली दुनिया की यहाँ, मानव करता चाह।।
असली फूल तो बाग में, हँसकर दे दे प्रान।
मिट कर भी महका गया, जग में अपनी सान।।
शोहरत की ऊँचाई पर, मिलता केवल दर्द।
भीड़ बड़ी संसार में, पर रिश्ते हैं सर्द।।
कागज़ के मत फूल बन, तज दे सब पाखंड।
सच्ची खुशबू से महक, जीवन रहे अखंड।।
भीतर कोई भाव ना, बाहर ठाट-बाट।
कागज़ के इन फूलों की, सजी हुई है हाट।।
दुख-सुख से जो डर गया, चुना कृत्रिम राह।
बेजान धागों से बुनी, उसकी हर एक चाह।।
माटी से उपजा भला, पल भर का मेहमान।
सच्चा जीवन वह जिए, जो महकाए जहान।।
छोड़ दिखावा रूप का, मन का दीप जलाए।
कागज़ के संसार में, असली फूल कहाए।।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
0 Likes

