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बाल-विवाह – रत्ना प्रिया

बाल-विवाह – रत्ना प्रिया

ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो,

बचपन, शिक्षा और यौवन को, मंजिल तो मिल जाने दो ।

 

वरदानरूप मिला यह जीवन, बने यह अभिशाप नहीं,

खेलना-कूदना हो बचपन, शोषण का संताप नहीं,

समझदारी की राह पकड़, व्यक्तित्व को सुलझाने दो ।

ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो ।

 

गरीबी और अशिक्षा ऐसी कुरीतियाँ पनपाती है,

बढ़ती बेरोजगारी, जघन्य अपराध करवाती है,

बाल-विवाह के कारण को जड़ से ही मिट जाने दो ।

ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो ।

 

गर्भाधान समय से पहले, स्वास्थ्य की बर्बादी है,

कानून-नियम ताक पर रखकर, बढ़ रही आबादी है,

है प्रथम सुख निरोगी काया, जन-जन को समझाने दो ।

ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो ।

 

कंधे मजबूत नहीं होंगे, कैसे बोझ उठायेगें,

कच्ची उम्र, आर्थिक तंगी में, मातु-पिता बन जाएँगे,

आत्मनिर्भर बनकर जग में, सफल उन्हें कहलाने दो ।

ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो ।

 

आँखों में उम्मीद की किरण, आँसू नहीं लाचारी का,

जीवन को अमूल्य समझें, सट्टा नहीं व्यापारी का,

सुख-दु:ख के दामन में पलकर, खरा-स्वर्ण बन जाने दो ।

ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो ।

 

रत्ना प्रिया

शिक्षिका (11 – 12)

उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर

चंडी , नालंदा

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