धरती से नाता टूटा है – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
शुभ दर्शन केवल कागज पर,
धरती से नाता टूटा है।
विजयादशमी आज अधूरी,
घर इसका किसने लूटा है?।।
पेड़ कटाई हुई निरंतर,
मौसम जग का गया बदल है।
हरियाली अब कहाँ दिखेगी,
गंगा का दम गया निकल है।।
वापस जाने की है बारी,
हृदय-कोश में सौरभ भर दो।
राह भटकते राही का मन,
कागज काला उजला कर दो।।
विवश पुत्र तेरा धरती पर,
द्वेष&राग तम से भारी है।
प्रेम आस दो फैला सद्य:,
जड़-चेतन तव आभारी है।।
लगी भूख कितनी हम-सब को,
जंगल झाड़ सभी मिल काटे।
उजड़े झोपड़ जीव-जंतु के,
निष्ठुर हाथों ने मिल बाँटे।।
सुहाने सौंदर्य धरती का,
लेकर प्राणी जो आए थे।
जोड़ स्वार्थ मानव ने उनसे,
अपना कह कर अपनाए थे।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
सेवानिवृत शिक्षक,
मध्य विद्यालय दरवेभदौर
पंडारक पटना बिहार
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