ध्वनि एक, अर्थ अनेक – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
सुनने और पढ़ने में जो,
लगते एक समान।
पर अर्थों की दृष्टि से,
होती भिन्न पहचान।।
ध्वनि की सूक्ष्म तरंग में,
झलके रूप अनूप।
काव्य सरल कर देता है,
इनका सुंदर रूप।।
अनल भड़कती वन में देखो, राख करे पल माहीं,
धीमे-धीमे बहे अनिल जो, सुख देती मन माहीं।
सुंदर प्यारा गृह है अपना, जहाँ बसे परिवार,
नभ मंडल में घूमें ग्रह सब, चंदा और सितार।
ऊँचे कुल में जन्म लिया तो, ऊँचे कर्म कमाओ,
नदिया के इस कूल बैठ तुम, अपनी प्यास बुझाओ।
बहता जाए स्वच्छ नीर यह, जीवन का आधार,
चिड़िया तिनका-तिनका चुनती, सजता उसका नीड़ प्यारा।
गगन बीच चमके जो तरणि, फैलाता उजियारा,
पार लगाए नदिया सबको, तरणी का पतवार प्यारा।
परीक्षा की अवधि है निश्चित, मत करना तुम देरी,
मीठी वाणी बोल रही जो, भाषा है वो अवधी मेरी।
वीर पुरुष के अंस (कंधे) पर ही, टिका देश का भार,
मेहनत का तुम अंश (भाग) न छोड़ो, यही सफलता का सार।
उगता सूरज दिन लाता है, मिट जाता अंधियारा,
कभी न समझो खुद को दीन, तुम हो प्रभु का प्यारा।
चिर काल से चली आ रही, संतों की यह वाणी,
द्रौपदी की लाज बचाई, प्रभु ने बढ़ाया चीर धानी।
अंत भला तो सब भला, आदि से सुंदर रीती,
लालच में जो भागे पीछे, हाथ लगे न आधी रोटी।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

