मन का चुनाव (राम या रावण)- उमेश कुमार सिन्हा
मन में उठते दो विकल्प हैं—एक सद्गुण, एक दुर्गुण छाया,
मनुष्य जब दुर्गुण अपनाता, उसने राक्षस रूप बनाया।
सद्गुण अपनाकर मानव इस, धरती पर पूजा जाता है,
स्वर्ग सरीखा सुंदर जीवन, वह जग में यहाँ बिताता है।
कौन कहता है सद्गुण के, सुंदर पथ पर चलना कठिन है,
हौसला अगर हो मन में तो, हर कार्य यहाँ सहज और सुगम है।
रावण दुर्गुण को अपनाकर, इतिहासों में रावण कहलाया,
राम सद्गुण को अपनाकर, जन-जन के मन में राम समाया।
शुरू हुए दोनों ‘रा’ से, पर राहें अलग बनाईं,
एक ने पाई अमर कीर्ति, एक ने कालिख कमाई।
प्रारंभ भले ही एक सा, पर अंत ने भाग्य संवारा,
अंतिम अक्षर ही तय करता, कौन जीता और कौन हारा।
‘म’ का अर्थ है धर्म, दया, और मर्यादा का वास,
‘म’ का अर्थ है प्रेम, समर्पण, मन में अटल विश्वास।
सद्गुण को अपनाकर ही, दशरथ-सुत राम कहलाए,
त्याग, सत्य और करुणा से, घट-घट में राम समाए।
पर रावण के अंत में बैठा, ‘वण’ का गहरा घाव,
‘वण’ यानी दुष्टता, अधर्म, और अहंकार का भाव।
पाप-कर्म को गले लगाकर, वह रावण कहलाया,
सीता-हरण और मद के कारण, उसने अपना वंश गंवाया।
अक्षर-अक्षर का है खेल, और कर्मों का यह खेल,
गुण-अवगुण के अंतर से, बनता जीवन का मेल।
एक ‘म’ से जग पावन करता, दूजा ‘वण’ से त्रस्त करे,
कर्म ही इंसान को यहाँ, राम या रावण स्पष्ट करे।
आओ मन के अहंकार और, दुर्विचारों के रावण को जलाएँ,
श्री कृष्ण के वचनों को सुन, मन को अपने वश में लाएँ।
सद्गुण अपनाकर ही मानव, जग में मान-प्रतिष्ठा पाए,
दूर करे अज्ञान का तिमिर, जीवन अपना उजियार बनाए।
स्वरचित रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक’
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
गोस्वामी तुलसीदास पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर
जिला – बक्सर

