आपका ब्राउज़र Text-to-Speech सपोर्ट नहीं करता।
दस सिरों का रावण – राकेश कुमार
दशहरा आया, शंख बजाओ, गूँजे जय-जयकार,
मन के रावण को भी मारो, यही विजय का सार।
कब तक कागज़ के पुतले को अग्निबाण दिखलाओगे?
कब अपने भीतर के दानव को जड़ से मिटा पाओगे?
दस सिर लेकर आज भी रावण मानव मन में पलता है,
बाहर पुतला जलता है, भीतर दानव चलता है।
एक-एक सिर एक विकार है, एक-एक अभिशाप,
इनके रहते कैसे मिटेगा मानवता का संताप?
प्रथम शीश है काम, जगाता वासना की ज्वाला,
दूजा क्रोध, विवेक हर ले, कर दे बुद्धि को काला।
तीजा लोभ, न कभी भरे जिसकी चाहत का प्याला,
चौथा मोह, सत्य पर डाल दे भ्रम का घना दुशाला।
पाँचवाँ मद, पद-धन के बल पर करता है अभिमान,
छठा मत्सर, परहित देखकर जलता है दिन-रात।
सातवाँ स्वार्थ, स्वयं के हित में भूले जग के नाते,
आठवाँ अन्याय, कुचल-कुचलकर निर्बल को तड़पाते।
नवाँ अमानवीयता, जिसमें करुणा का अवसान,
दसवाँ शीश अहंकार, स्वयं को माने भगवान।
दस सिर, दस दुर्गुण, दस बंधन, दस पतन के द्वार,
इनको जीते बिना अधूरी हर विजय की धार!
काम जले, संयम जागे; क्रोध जले, विवेक,
लोभ जले, संतोष खिले; मोह हटे, हो नेक।
मद के बदले विनय विराजे, मत्सर मिटे, सद्भाव,
स्वार्थ हटे, सेवा मुस्काए, न्याय बने स्वभाव।
निर्दयता की राख उड़े, करुणा का विस्तार,
अहंकार का अंत हो, ऊँचा हो मानव का मान।
तब जाकर इस देश धरा पर नई प्रभा छाएगी,
तब सच्चे अर्थों में धरती रामराज्य कहलाएगी।
केवल जय श्रीराम कहने से राम नहीं मिलते हैं,
राम-सदृश आचरण से ही जीवन-पथ खिलते हैं।
जहाँ न्याय हो, दया हो, समता का सम्मान,
जहाँ न कोई दीन-दुखी हो, ऊँचा हो इंसान।
पुतला जलाना सरल बहुत है, मन को कौन जलाए?
अपने भीतर छिपे रावण को कौन आज हराए?
आओ, आज प्रतिज्ञा कर लें, बदलेंगे व्यवहार,
दसों सिरों को भस्म करेंगे, यही विजय-त्योहार!
बाहर रावण दहन तभी हो भीतर राम जगाएँ,
अपने कर्मों से धरती पर र
राकेश कुमार,
विज्ञान शिक्षक,
मध्य विद्यालय, अमौना।

