पाषाण में परमात्मा – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
जब गोकुल पर मँडराया संकट, इंद्र का कोप अपार था,
तब श्रीकृष्ण ने उठाया पत्थर, उंगली पर गोवर्धन धार था।
गोप-ग्वालों की रक्षा की, प्रलय से सबको बचाया था,
एक पत्थर ने ही उस दिन, भगवान का रूप दिखाया था।
जब मूर्छित पड़े थे लक्ष्मण जी, छा गया था संकट भारी,
तब हनुमान जी पत्थर लाए, द्रोणागिरि की महिमा न्यारी।
संजीवनी बूटी संग वो पूरा, पर्वत उठा कर लाए थे,
उस पत्थर के ही कारण, लखन के प्राण लौट कर आए थे।
जब सीता माता की खोज में, सागर पार जाना था,
तब पत्थरों पर ‘राम’ लिख, एक अद्भुत सेतु बनाना था।
तैर गए वो भारी पत्थर, पानी ने भी राह दिखाई थी,
उसी रामसेतु के बल पर, सेना लंका में समाई थी।
जब आई केदार में प्रलय, हर तरफ मची तबाही थी,
तब एक भीम शिला पत्थर ने, मंदिर की लाज बचाई थी।
रोक लिया हर संकट को, वो ढाल बनकर अड़ गया,
उस महादेव के पत्थर के आगे, प्रलय का पानी मुड़ गया।
फिर भी दुनिया पूछती हमसे, तुम पत्थर क्यों पूजते हो?
इसके पीछे छिपे प्रेम और, इतिहास को क्यों भूलते हो?
यह महज़ कोई चट्टान नहीं, इसमें हमारी आस्था और विश्वास है,
हर संकट में जो साथ निभाए, यह वही पत्थर ख़ास है!
अहिल्या सी नारी तर गई, जब प्रभु के चरण छुए पाषाण,
कण-कण में शंकर बसते हैं, यही है सनातनी ज्ञान।
जो छेनी-हथौड़ी की चोट सहे, वो मूरत बन पूजा जाता है,
जो धीरज रखना सीख गया, वही तो जग में ईश्वर कहलाता है।
इतिहास गवाह है संकट में, इसी ने मर्यादा को पाला है,
यह केवल कोरी शिला नहीं, इसमें छुपा सवेरा उजाला है।
मंदिर की नींव से कलश तक, हर रूप में इसने साथ दिया,
मानव की अटूट आस्था को, इस पाषाण ने ही सनाथ किया।
फिर भी दुनिया पूछती हमसे, तुम पत्थर क्यों पूजते हो?
इसके पीछे छिपे प्रेम और, इतिहास को क्यों भूलते हो?
यह महज़ कोई चट्टान नहीं, इसमें हमारी आस्था और विश्वास है,
हर संकट में जो साथ निभाए, यह वही पत्थर ख़ास है!
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

