प्रकृति वधू का रूप ले, पुलकित रही निहार।
पुरुष प्रकृति का है मिलन, मन में लिए विचार।।
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, विदित सकल संसार।
इसी दिवस ब्रह्माण्ड का, शुभदारंभ प्रसार।।
शैलसुता पितु गेह में, सज-धज कर तैयार।
आयेंगे अब सोचती, साजन मेरे द्वार।।
फूलों ने खिलकर किया, खुशियों की बौछार।
प्रणय की महारात्रि में, महका है घर-बार।।
रहा विरत जो लोक से, किया लोक स्वीकार।
खुद के आधे रूप को, लेने आए द्वार।।
प्रकृति रूप है पार्वती, नारी का आधार।
पुरुष रूप को शिव लिए, प्रकट हुए संसार।।
परम पुनीत त्रयोदशी, करता है उद्धार।
शिव के भक्तों का सदा, होता बेड़ा पार।।
शिवा-शिव के गले दिए, वरमाला का हार।
मायापति के संग में, लिए नया अवतार ।।
प्रणय प्रेम होता सदा, होना एक विचार।
जो जाने इस मूल को, सो जाने जग सार।।
विधि खुद विधि से चल रहा, ले परिजन का प्यार।
शरणागत पाठक हुआ, शिव-शिव करे पुकार।।
राम किशोर पाठक
प्राथमिक विद्यालय भेड़हरिया इंगलिश पालीगंज, पटना