- मुझे चांद पर जाना है
मां एक एरोप्लेन दिला दो,
मुझे चांद पर जाना है।
कहती हो मेरे मामा हैं,
उनको घर पर लाना है
मां एक एरोप्लेन दिला दो,
मुझे चांद पर जाना है।
दिखता है चेहरा चमकीला,
आँखें नज़र न आती हैं।
गोल–गोल बस दिखते मुझको,
जैसे गोल चपाती है।
रात हुई तो बाहर आते,
कहां वो दिन भर रहते हैं?
मानो! जैसे लुका–छिपी,
मुझसे खेला करते हैं।
उनके कंधे पर चढ़ कर के,
मुझे सैर पर जाना है।
मां एक एरोप्लेन दिला दो,
मुझे चांद पर जाना है।
जाकर पूछूंगा उनसे मैं,
तंग मुझे क्यों करते हैं?
मैं नन्हा सा, प्यारा सा हूँ,
गोदी क्यों ना रखते हैं?
ढेर खिलौने, चॉकलेट, कपड़े,
मेरी ख़ातिर कब लाओगे?
इधर–उधर बस घूमा करते,
मां से मिलने कब आओगे?
हलवा, पूरी, खीर, मिठाई,
उनको मुझे खिलाना है।
मां एक एरोप्लेन दिला दो,
मुझे चांद पर जाना है।
धीरज कुमार सिंह
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