फिर रावण जलेगा – संजीत कुमार निगम
आज फिर रावण जलेगा,
हाँ, वही रावण,
जिसे त्रेता से हर साल जलाया जा रहा है,
लेकिन हर साल वह
एक नए चेहरे के साथ लौट आता है।
आज फिर अभिमान का वध होगा,
उसी अभिमान का,
जिसे कल से फिर पालना है।
आज फिर बुराई को मारा जाएगा,
उसी बुराई को,
जिसे कल से फिर दोहराना है।
आज फिर दशानन का हर आनन जलेगा,
भीड़ जय श्रीराम के नारे लगाएगी,
और उसी भीड़ में खड़ा कोई इंसान
कल फिर किसी के स्वाभिमान को कुचलेगा।
आज फिर नारी-शक्ति के सम्मान की बातें होंगी,
नारी की महिमा के गीत गाए जाएँगे,
लेकिन कल फिर किसी बेटी की चीख
इंसाफ़ के दरवाज़े पर दम तोड़ती नज़र आएगी।
आज फिर रावण को जलाकर
हम अपने राम होने का उत्सव मनाएँगे,
लेकिन अपने भीतर बैठे रावण से
नज़रें चुराकर घर लौट जाएँगे।
आख़िर कब तक पुतले जलेंगे
और बुराइयाँ ज़िंदा रहेंगी?
कब तक राम की पूजा होगी
और रावण की प्रवृत्तियाँ पलती रहेंगी?
रावण तो बस एक प्रतीक है,
असली रावण तो वह सोच है,
जो खुद को सही साबित करने के लिए
दूसरों का सम्मान कुचल देती है।
इसलिए, रावण जलाना है
तो सिर्फ़ मैदान में मत जलाओ,
अपने भीतर झाँको,
अपने अहंकार को पहचानो,
अपनी बुराइयों को मिटाओ।
क्योंकि रावण हर साल जलता है,
फिर भी हर साल लौट आता है।
जिस दिन इंसान अपने भीतर के रावण को जला देगा,
उस दिन शायद किसी मैदान में
रावण जलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
संजीत कुमार निगम
प्राथमिक विद्यालय आदिवासी टोला मधुरा फारबिसगंज अररिया
