Site icon पद्यपंकज

राखी का त्योहार – अश्मजा प्रियदर्शिनी

Asmaja Piriyadarshi

Asmaja Piriyadarshi

राखी का त्योहार – अश्मजा प्रियदर्शिनी

संस्कृति की है महिमा, कृष्णा बन गए भ्राता,
रक्षाबंधन पावन, अनुपम है त्योहार ,
दिया आधार कृष्ण ने,बहन बनी द्रोपदी,
कच्चे धागे धर्म जैसे, माधव का है आभार।
देवत्व ज्ञान समेटे, पुनीत है रिश्ता नाता,
पावन है ये उत्सव, कीर्ति है दिव्य विशाल,
धागों का अटूट रिश्ता, शुभ बंधन से बँधा,
भाई बहन का प्रेम, परम्परा की मिसाल।
इन्द्रधनुष सी छटा,घर आँगन में शोभे,
सुरों का है सरगम, खुशियों की है बहार।
गूँजे पक्षी की चहक,पुष्पों में छाती महक,
सप्त तुरंग की दौड़, है ये लौकिक त्योहार।
है सावन की पूर्णिमा,हर्ष उल्लास का मर्म,
रक्षा सूत्र बंधन है, अनुपम है संस्कार।
फल मिष्ठान व्यंजन, रीति नहीं ये राखी की,
त्याग दया समर्पण, है यथोचित सत्कार ।
माँ श्री ने बली को बाँधा, स्नेह भाव का रक्षा सूत्र,
नेमित निभाते हरि,वचन से गए छूट।
कच्चे धागे की महत्ता, सकल गुणों की खान,
भक्ति की है पराकाष्ठा,प्राण जाए चाहे छूट।
सृष्टि के पालनहार,वादाबद्ध पाताल में,
विष्णु बने द्वारपाल,ले वामन अवतार।
जन्म का बंधन नहीं, है भव भावना का मंत्र,
पौराणिक कथा सुनी, जीवन का है ये सार।
नैहर पिया के मध्य, संबंध की बुनियाद,
अनुपम व्यवहार, जैसे सेतु का आधार।
कोरी कल्पना नहीं है, ये विधि का है विधान,
रक्षाबंधन पवित्र, रक्षण का है त्योहार।

रचनाकार: अश्मजा प्रियदर्शिनी
हेड टीचर ,प्राथमिक विद्यालय धमौल,धनरूआ
पटना, बिहार

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version