वीरहन के बसंत-आर. पी. ‘राज’-पद्यपंकज

वीरहन के बसंत-आर. पी. ‘राज’

वीरहन के बसंत

गलवान घाटी के वीरहन के आँसु में,
वसंती बहार बह़ गईल।
कइसे हो स्वागत बसंत के
हीयरा के सगरी अरमान

ऑंसुअन मे द़ह गईल।

छुट्ल न महा़वर के रंग,
सेनुर सुहाग के दह़ गईल।
हीयारा के सगरी अरमान,

‘भारती’ पर कुरबान भईल
शहीद वीरहन के आँसु में,
वसंती बहार बह़ गईल।

देख तिरंगा में लिपटल लाशन के,
बुढ़उती आखिन से गर्व के
आंसु झरझर झर गईल।

ओह आंगन के नमन करी
कुसमयीए जेकर ”सपूत” गईल।
शहीद वीरहन के आँसु में,
वसंती बहार बह गईल।

मन मसोस के रह जाला,

ओह ‘सपूतन’ के राह में।

रहीत हमरो एगो ‘पूत’ गईल
शहीद वीरहन के आंसू में,
वसंती बहार बह़ गईल।

आर. पी. ‘राज’
गोपालगंज

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