आओ झण्डा फहराएँ काल के कपाल से, तीर भालों के बौछार से। यूँ ही नहीं मिली आजादी, गाँधी अहिंसा के तलवार से। माँओं की गोद सुनी हुई , कितनी मांग…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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