लोहार लोहे पर निर्भर जीवन,लोहार हूॅं मैं।कम पैसे में काम करूॅं,उपकार हूॅं मैं।विस्मित कर देता जग को,फनकार हूॅं मैं।मानसून के संग चलूॅं,बौछार हूॅं मैं।जिसने बसा लिया उसका,संस्कार हूॅं मैं।चोर उचक्के…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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