हे गुरुवर जब था मन कोरा मेरा कलम पकड़ना आपने सिखाया आरी तिरछी लकीरों से गुरूवर ने सुलेख लिखाया रोम रोम कृतज्ञ गुरूवर आपके अनंत उपकारों से जीवन आज बना…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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