विवशता प्रकृति ने गजब रौद्र रूप अपनाई है , एक तरफ है कुंआ तो दूसरी तरफ खाई है । हे ईश्वर ये तूने कैसी घड़ी लाई है । चहुँ ओर…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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