स्व-रचित – कविता
मत छीनो बचपन – बाल विवाह
1. नन्हीं सी गुड़िया है,
बागों की कलियाँ है।
हुआ न बचपन पूरा है,
यौवन अभी अधूरा है।
2. कांच कली है, नन्हीं सी परी है,
न बांधो शादी के इस बंधन में।
यह परम्परा नहीं, अन्याय है,
न डालो जिम्मेदारियों के बंधन में।
3. हाथों में चूड़ी नहीं, कलम दो,
हाथों में मेंहदी नहीं, पहचान दो।
मांगो में सिन्दूर नहीं, अरमान दो,
हर बेटी को सम्मान दो।
4. न पढ़ने का अवसर मिला,
न कोई संस्कार मिला।
न निर्णय लेने का अधिकार मिला,
बाल विवाह वरदान नहीं, अभिशाप मिला।
रचयिता- मुन्नी कुमारी
प्रधान शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय मोहनपुर मुशहरी
प्रखण्ड- झंझारपुर, मधुबनी
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