मकर संक्रांति-देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

 

मकर संक्रांति

उत्तरायणी पर्व का, हुआ सुखद आगाज।
ढोल नगाड़े बज रहे, होंगे मंगल काज।।

सूरज नित अभिराम है, जीवन का आधार।
देव रूप पूजे सदा, सारा ही संसार।।

बदल दिशा दिनकर रहे, छाई खुशी अपार।
पावन भावन रूप में, आया यह त्योहार।।

गुड़ तिल के शुभ गंध से, महक रहा घर द्वार।
ऐसी नेक सुगंध की, चहुँदिशि बहे बयार।।

रूप गगन का देखकर, छाई नई उमंग।
नेह प्रेम उर जग रहा, भ्रात जनों के संग।

ले पतंग बहुरंग की, बच्चे खुश हैं आज।
उड़ी पतंग को काटते, बालक संग समाज।।

बेला है यह संक्रमण, रखें देह का ध्यान।
दही संग खिचड़ी सदा, उत्तम भोजन जान।।

कटती हुई पतंग यह, देती है सन्देश।
जीवन नश्वर ही सदा, रखें न कोई क्लेश।।

चिंता तज चिंतन करें, करें सूर्य का ध्यान।
उगते सूरज को सदा, असल देवता मान।।

तिल तिल संकट नित कटे, बढ़े प्रेम उल्लास।
यही दिव्य सबसे कहे, हिय में रखें मिठास।।

 

मॉं

माँ ही जग में प्रथम गुरु, देती पहला ज्ञान।
शीश झुकायें चरण में, करें सदा सम्मान।।

महिमा माँ की जानिए, माँ है देवी रूप।
कौन चुका सकता कभी, ममता बड़ी अनूप।।

गुणातीत ममतामयी, रखती हृदय विशाल।
नेह सुधा का पान कर, छूती शिशु के गाल।।

माँ है मूरत त्याग की, वत्सलता की खान।
माँ की सेवा से मिले, जीवन में सम्मान।।

दुख को आँचल में छुपा, रखती मन विश्वास। तपना सीखो कष्ट में, करे यही अरदास।।

सागर सा गहरा हृदय, माँ को लो पहचान।
जैसा ऊँचा है गगन, वैसा दें सम्मान।।

शिशु को अपने अंक में, रखकर करे दुलार।
प्यारी थपकी से सुला, लाती खुशी अपार।।

जननी देवी रूप है, सदा कीजिए मान।
जननी से बनती सदा, बालक की पहचान।।

बालक के हित ज़िन्दगी, करती है बलिहार।
सब प्यारों में श्रेष्ठ है, माँ का सच्चा प्यार।

देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

भागलपुर, बिहार

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