फाग-राम किशोर पाठक

Ram Kishore Pathak

हुआ है धूमिल सभी उमंग।

फाग में कैसे खेलें रंग।।

लगे हैं रोटी में श्रीमान।

सदा हैं वे भी तो हलकान।।

याद उनको भी आती रोज।

रहे नित अवसर को ही खोज।।

नहीं अपनी सजनी के संग।

फाग में कैसे खेलें रंग।।

रहे हम रात-रात भर जाग।

वदन में जैसा लगता आग।।

कही सुन आती जब मैं फाग।

नवल उठता है चित में राग।।

फड़कने लगता मेरा अंग।

फाग में कैसे खेलें रंग।।

खले अब कोयल की हर तान।

कहीं निकल न अब जाए जान।।

सदा उनका ही रहता ध्यान।

सजन अब तो ले लो संज्ञान।।

करे यह मौसम मुझको तंग।

फाग में कैसे खेलें रंग।।

गीतकार:- राम किशोर पाठक

प्रधान शिक्षक

प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला बिहटा, पटना, बिहार।

संपर्क- 9835232978

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