पर-हित चिंतन-राम किशोर पाठक

Ram Kishore Pathak

पर-हित चिंतन- दोहा छंद गीत

पर-हित चिंतन में सदा, रहते हैं जो लीन।
ईश्वर की उनपर कृपा, रहती नित्य नवीन।।

पर-पीड़ा से हो दुखी, करते सदा उपाय।
करते नहीं विचार हैं, चाहे कम हो आय।।
पर-पीड़ा को देखकर, बहे नयन जल-धार।
जितना उनसे बन पड़े, मदद करें हर बार।।
चिंता अपनी है नहीं, फिर भी हो गमगीन।
पर-हित चिंतन में सदा, रहते हैं जो लीन।।०१।।

तत्पर हर-पल जो रहे, जिसका सद्व्यवहार।
समझ रही दुनिया उसे, ईश्वर का अवतार।।
जीवन है तो कष्ट का, होनी है भरमार।
मानव वह ही श्रेष्ठ है, करता जो उपकार।।
अपनी क्षमता से करे, मदद दुखी हर दीन।
पर-हित चिंतन में सदा, रहते हैं जो लीन।।०२।।

सबमें ईश्वर अंश है, करिए जरा विचार।
उपकारी रख भावना, बढ़ें कदम दो चार।।
कर्म चलाता विश्व को, है गीता का सार।
जैसी करनी आपकी, वैसी लें स्वीकार।।
हानि-लाभ जीवन मरण, सबसे है स्वाधीन।
पर-हित चिंतन में सदा, रहते हैं जो लीन।।०३।।

गीतकार:- राम किशोर पाठक

0 Likes
Spread the love

Leave a Reply