आजादी के लिए यातना सहकर, सूरमा नहीं विचलित हुए, विघ्न बाधाओं से लड़कर, गुलामी से मुक्ति दिलवाए। बाबू वीर कुँवर सिंह ने, हाथों की बलि चढ़ाई। आजाद लड़ते-लड़ते, अंतिम गोली…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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