खुशी खुशी, आज-कल कहां टिकी रहती हो? इस भाग-दौर में ज्यादा नहीं मिलती हो!! लगता है अब भाव भी अधिक खाती हो! न जाने आकर फिर कहां चली जाती हो!!…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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