“तू”चल अकेली वज़ूद है”तू”इस सृष्टि की दुनियां की है अबूझ”पहेली” , समझेगा कौन तेरे मन को छोड़ दे सब”तू”चल अकेली । बंट गई है रिश्तों में कितने कब बन पाई…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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