पितृ तर्पण – निश्छल छंद देख रहें हैं पूर्वज अपने, करिए जाप। भूल गए या याद किए हैं, उनको आप।। आश्विन आया पूर्वज रखते, तर्पण खास। देख रहें हैं बस…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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