प्रतीक्षा व्याकुल हृदय में व्यथा भरी, मन मायूसी से घिरा हुआ, मेरे हरि ! मेरे अंतरयामी ! प्रतीक्षा का अंत कर दो ज़रा। कभी घोर तमस हो जीवन में, नहीं…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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