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खिली जो कलियाँ ले नव रंग।
फाग में महका है हर अंग।।
देख कर फूलों का शृंगार।
भ्रमर ने छेड़ा कोई तार।।
प्रीत है गाता उसका गान।
सुनी तो कलियाँ हैं हलकान।।
मचल कर बोली मत कर तंग।
फाग में महका है हर अंग।।०१।।
आम की डलियों में है बौर।
महक से मिलता मन को ठौर।।
सुनाती कोयल है संगीत।
कूक में भरकर अपने प्रीत।।
निगोड़ी दिल है मेरा दंग।
फाग में महका है हर अंग।।०२।।
जंग करता है सारा अंग।
अभी है बदला मेरा ढंग।।
नैन है मेरे अब बेचैन।
नींद भी खोई सारी रैन।।
नशे में जैसे पीकर भंग।
फाग में महका है हर अंग।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला, बिहटा, पटना, बिहार।

