दरस देतीं प्रथम माता, कहाँ हो तुम चली आतीं। क्षुधा प्यासा ललन बैठा, पके दाना तुम्हीं लातीं। दया कर के परोसीं वो, मिटी जो भूख खाने से। कसम से आज…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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