ज़रा संभल ऐ राही ज़रा संभल बाहर निकलने के लिए न मचल काल रूप धर आया है बनकर कोरोना इसे तुम समझो न बच्चों का खिलौना काल कल्वित आंकड़े निरन्तर…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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