यहाँ काल के कपाल पर ,
निज कर्म अमिट होता गया ।
जो स्वप्न में धरे रह गए ,
वह सर्वस्व स्वाहा हो गया ।
निज को सुधार सँवार लो ,
फिर समर में बढ़ते चलो ।
कहीं खो न जाए लक्ष्य तेरा ,
संयम सदा रखते चलो ।
दृष्टि रखो शिखर पर ,
जब तुम में हो दक्षता ।
समदृष्टि से सृजन करो ,
यही तुम्हारी निष्पक्षता ।
निष्पक्षता में सत्य का ,
आधान होता है सदा ।
कर्म में ज्ञान का ,
प्रावधान होता है सदा ।
ज्ञान से विश्वास बढ़ता ,
विश्वास से बढ़ते कदम ।
कदम जो बढ़ता पथिक का ,
रोक न पाता कोई यतन ।
संयम सदा नित साधना में ,
मौन की अभिव्यक्ति हो ।
पर के लिए जो काम आए ,
उसकी उसे भी शक्ति हो ।
जीवन कलुष न हो सके ,
नित -नित सँवारते चलो ।
जो गिर गया हो कूप में ,
उसे निकालते चलो ।
वही जीवन सुधन्य है ,
जो पर के लिए है जिया ।
कर्त्तव्य के आलोक में ,
लगता उसका हरदम हिया ।
रच<strong>नाकार :-
अमरनाथ त्रिवेदी
प्रधानाध्यापक ,
उत्क्रमित उच्च विद्यालय बैंगरा
प्रखंड – बंदरा ( मुज़फ़्फ़रपुर )