सुलक्षणा बेटी – मनु कुमारी-पद्यपंकज

सुलक्षणा बेटी – मनु कुमारी

Manu

खुशियों का संसार है बेटी ,
प्रेम का सुंदर उपहार है बेटी,
बेटों को जो विनम्र बनाये,
ममता,स्नेह व प्यार है बेटी।

हर मुश्किल का हल है बेटी,
गंगा का निर्मल जल है बेटी ,
दिल के द्वार खोल के देखो,
संसार का सुंदर पल है बेटी।

ईश्वर का वरदान है बेटी,
मां पापा की जान है बेटी,
हर क्षेत्र में परचम लहराकर,
बढ़ाया विश्व का मान है बेटी।

सामा,राखी त्योहार है बेटी,
शील का पहनी हार है बेटी,
देश रक्षा में चूड़ियां तोड़ कर,
कर लेती तलवार है बेटी।

पिता पगड़ी की लाज है बेटी,
भाईयों का सिरताज है बेटी,
नैहर में हर रिश्तों को सहेजे,
करती कामकाज है बेटी।

सास- ससुर की आयु बेटी,
सेवा से करे शतायु बेटी,
पतिव्रता जगजननी बनकर,
पति को भी करे चिरायु बेटी।

लक्ष्मी सा व्यवहार है बेटी,
मां का उत्तम संस्कार है बेटी,
परिवार को कभी न टूटने जो दे,
संयम धैर्य और प्यार है बेटी।

खुशियां सबको देती बेटी,
बदले में कुछ ना लेती बेटी,
तन मन से परिवार को सेती,
उभयकुल का मान बढ़ाती बेटी।

नदी का कहो किनारा बेटी,
खुशियों का है नगाड़ा बेटी,
भले कोई उसे बोझ समझ लें,
पर हर पल बनी है सहारा बेटी।

सीता जैसी पावन बेटी,
लक्ष्मी सी मनभावन बेटी,
बुरी नजर जब डाले कोई,
मिटा दे कालरात्रि बन बेटी।

साहस शौर्य की कथा है बेटी,
मिटाती मां की व्यथा है बेटी,
बेटा भाग्य से आता है लेकिन,
सौभाग्य लेकर आती है बेटी।

बेटा वंश वंशिका बेटी,
बेटा हंश हंसिका बेटी,
बेटी से हीं बेटा संभव,
श्रृष्टि का मूल आधार है बेटी।

स्वरचित:-
मनु कुमारी
मध्य विद्यालय सुरीगांव, प्रखण्ड बायसी,जिला- पूर्णियाँ, बिहार

 

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