Author: Dev Kant Mishra

Jainendra Prasad Ravi

विधा- रूप घनाक्षरी: जैनेन्द्र प्रसाद रविविधा- रूप घनाक्षरी: जैनेन्द्र प्रसाद रवि

0 Comments 5:33 am

किसान “”””””””””””””””” फसल बोने के पूर्व, खेतों की जुताई हेतु, सुबह ही चल देते, हल बैल ले के संग। हरियाली[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें
Girindra Mohan Jha

खुद मनुष्य बन, औरों को मनुष्य बनाओ- गिरीन्द्र मोहन झाखुद मनुष्य बन, औरों को मनुष्य बनाओ- गिरीन्द्र मोहन झा

0 Comments 5:57 pm

सदा कर्मनिष्ठ, सच्चरित्र, आत्मनिर्भर बनो तुम, जिस काम को करो तुम, उससे प्रेम करो तुम। नित नई ऊँचाई छूकर, सदा[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें

स्वर्ग और नर्क की कल्पना – नीतू रानीस्वर्ग और नर्क की कल्पना – नीतू रानी

0 Comments 10:49 pm

स्वर्ग नरक कहीं और नहीं है इसी पृथ्वी पर सब। जरा सोचिए बैठकर, समय मिले एक पल तब।। इसी पृथ्वी[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें
Devkant

दोहावली-देव कांत मिश्रदोहावली-देव कांत मिश्र

0 Comments 2:30 pm

दोहावली हे माता जगदम्बिके, तू जग तारणहार। अनुपम दिव्य प्रताप से, संकट मिटे हजार।। बढ़ना है जीवन अगर, चलिए मिलकर[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें
Devkant

मातृभूमि-देव कांत मिश्रमातृभूमि-देव कांत मिश्र

0 Comments 6:17 pm

मातृभूमि मातृभूमि है अपनी प्यारी, जन-जन को बतलाना है। इसकी नित रक्षा की खातिर, सुन्दर भाव जगाना है।। देखो माटी[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें
Devkant

मैं भारत हूँ-देव कांत मिश्रमैं भारत हूँ-देव कांत मिश्र

0 Comments 4:59 pm

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ, सदा रहूँगा, ऐसा ‌ही बतलाऊँगा। माटी के कण-कण से सबको, अभिनव गुण सिखलाऊँगा।। पत्ते[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें
Devkant

चौपाई-देव कांत मिश्र दिव्यचौपाई-देव कांत मिश्र दिव्य

0 Comments 2:11 pm

केवट कथा आएँ निर्मल कथा सुनाएँ। भक्तों का हम मान बढ़ाएँ।। राम कथा में ध्यान लगाएँ। मनहर सुखद शांति नित[...]

और पढ़ेंऔर पढ़ें