चाहता चरण धूल
नहीं मांँगता हूंँ धन,
भरा पूरा परिजन,
भावना सहित तन-मन हो समर्पित।
पास नहीं फल-फूल,
चाहता चरण धूल,
श्रद्धा सुमन तुझको करता हूंँ अर्पित।
तेरी करूणा कि आस,
मन में लिए विश्वास,
कभी तो दरस प्रभु, दोगे मुझे किंचित।
नहीं देना पद-मान,
जिससे हो अभियान,
वही मुझे देना नाथ, जिसमें हो मेरा हित।
जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
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