मेरी बेटी तुम केवल ऊंची उड़ान ना भरो
ऐसा भी करो कि एक कदम तुम्हारा धरती पर भी धरो…..।
मेरी बेटी यहां केवल उजाला ही नहीं,
तुम इस लगातार स्याह होती दुनिया में एक मशाल बनो……।
मेरी बेटी तुम में बची रही आखिर तक कोमलता,
पर जहां जरूरी हो दृढ़ता वहां पहाड़ सी मजबूत बनो…..।
मेरी बेटी इस लगातार नफरत से भरती दुनिया में,
तुम बुद्ध सा करुणा का सागर बनो, तुम प्रेम बनो, तुम अच्छाई बनो…..।
मेरी बेटी, तुम्हारा हृदय भी भरा हुआ है तुमुल कोलाहल से,
किंतु पर हृदय का शोर शांत करने को, तुम शांति बनो, दुखों का संधान बनो…..।
मेरी बेटी तुम्हारी चौहद्दी तुम्हारा घर नहीं,
तुम्हारा वितान यह सारा आकाश है, इसे साधो, आगे बढ़ो…..।
मेरी बेटी लगातार चुप और कायर होती जा रही दुनिया में,
तुम साहस बनो, सत्य की पताका बनो, निर्भया बनो…..।
मेरी बेटी, यह दुनिया पुनः अंधविश्वास की गुफा में लौट रही है
तुम उनका रास्ता बनो, प्रणेता बनो, दिखाओ सभी को राह विज्ञान की……।
मेरी बेटी, सिमट कर रहना तुम्हारा काम नहीं,
तुम आशा बनो, सकारात्मक बनो, आत्मविश्वास का दूसरा नाम बनो……।
मेरी बेटी, निराशा ने घेर लिया है चहुं ओर से मनुष्य को,
इस अवसाद से भरती दुनिया में, तुम उल्लास का सागर बनो, खुशियों के झरने सा बहो, उम्मीद का अंकुर बनो…..।
मेरी बेटी, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या से भरती जा रही दुनिया में
तुम त्याग, साझेपन और नि:स्वार्थ भावना की मिसाल बनो…..।
मेरी बेटी, अभिमान की अपनी महत्ता है,
किंतु नहीं कहूंगी की खुद पर बेफिजूल का नाज करो, किसी दूसरे मनुष्य की शर्त पर अपने ऊपर गर्व करो…..।
मेरी बेटी, शरीर की सुंदरता तो अपनी जगह है,
पर सबसे बड़ी खूबसूरती हृदय की है, तुम अपने ज्ञान और स्नेह से सुंदर बनो…..।
मेरी बेटी, लगातार अराजक हो रही इस दुनिया में,
तुम हक की आवाज बनो, एकता की डोर बनो…..।
मेरी बेटी, दुनिया में उल्हानों की बहुत सारी जंजीरे हैं
तुम अनसुना करो इन उल्हानों को, उन्मुक्त पंछी बनो, अपने सपनों की बुलंद उड़ान बनो…..।
मेरी बेटी, ये रीति रिवाज, ये शर्म, ये हया, ये मर्यादा की बातें महज बहाने हैं तुम्हें बांधने के
एक दुनिया जो निर्णय से भरी है, तुम शिक्षित बनो, स्वावलंबी बनो, तुम खुद का यकीन बनो…..।
सुमन सौरभ (शिक्षिका)
जगतारिणी उत्क्रमित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय खम्हार,विभूतिपुर,
समस्तीपुर, बिहार
