शिक्षा की देहरी पर दीप जले,
आदर्शों में सपने पले।
पर पावन उस प्रांगण में अब
कुछ मौन-से मोल टँगे मिले।
जिस मान का मूल चरित्र रहा,
जिस गौरव की जड़ तप में थी—
वह मान सिमटकर रह गया
सूची, शर्त और पावती में ही।
कहते हैं— “आप चुने गए”,
स्वर मधुर, अर्थ संकोच भरे।
पीछे कोई छाया चलती है
जो अनकहे संकेत धरे।
जहाँ प्रतिभा ठहर-सी जाती है,
और चमक को स्वर मिल जाता है—
वहाँ दीप नहीं जलता अंतर में,
बस मंच उजास दिखाता है।
प्रमाण-पत्रों की उजली पंक्तियाँ
कुछ प्रश्न चुपचाप लिख जातीं।
ट्रॉफी चमकती पल-भर को,
आत्मा मौन-सी रह जाती।
शिक्षक सौदे की भाषा नहीं,
वह दीपक है— निस्पृह, महान।
जो जलकर भी उजाला दे,
न माँगे मूल्य, न चाहे मान।
अब मौन नहीं, अब संकेत है—
संयम से उपजा संकल्प नया।
मान देना हो तो निर्मल दो,
शर्तों को सम्मान न कहो सदा।
न बिकेगा भाव, न झुकेगा सत्य,
न चमक के आगे मान हारे।
सच्चा पुरस्कार वही है जो
गुरु को ऊँचा, समाज सँवारे।
रचना- विनोद कुमार विमल
शिक्षक,समस्तीपुर
