नर ही नारायण छोड़ पुष्पों की सेज सुहानी जो काँटों का बिस्तर अपनाए कर्मपथ पर सतत चलकर जो सबका पथ प्रदर्शक बन जाए परहित समर्पित वह नर ही जीवन में…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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