प्रभाती पुष्प – जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’ बाबा औघड़ दानी धतूरा के फूल गंगा जल पर रीझते हो, तभी तो औघड़[...]
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प्रभाती पुष्प – जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’प्रभाती पुष्प – जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
श्याम वंशीवाला सिर पे मुकुट मोर, गोपियों के चित्तचोर, होंठ लाले-लाल किये, खड़ा बंसी वाला है। कहते हैं ग्वाल-बाल, मित्र[...]
अँखियाँ भिगोने से- जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’अँखियाँ भिगोने से- जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
मनहरण घनाक्षरी छंद कड़ी धूप खिलने से- परेशानी बढ़ जाती, मौसम बदल जाता, बरसात होने से। मजदूर किसानों की- मेहनत[...]
ठंड का प्रकोप- जैनेन्द्र प्रसाद रवि’ठंड का प्रकोप- जैनेन्द्र प्रसाद रवि’
पशु पक्षी सरीसर्प बैठे हैं दुबक कर, आज आधा भारत है शीत की आगोश में। कड़ाके की ठंडक से हाथ[...]
