प्रभाती पुष्प – जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
बाबा औघड़ दानी
धतूरा के फूल गंगा
जल पर रीझते हो,
तभी तो औघड़ दानी, कहलाते भोलेनाथ।
राजा-रंक तुझे प्यारा,
तूने सभी को है तारा,
सबका पालनहार, बनकर दीनानाथ।
करते हैं विषपान,
बसें जाकर श्मशान,
रहते पहाड़ों पर, बन के कैलाश नाथ।
भक्त हेतु उमापति
कहलाए पशुपति,
राम भक्ति कर प्रभु, बन गए विश्वनाथ।
जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’

